Wednesday, 25 December 2013

50 q.a.

1. भरतेश्वेर बाहुबलि घोर (1168 ई.) राजस्थानी भाषा का सबसे
प्राचीन जैन ग्रन्थ है, जिसमें भरतेश्वर और बाहुबलि के बीच हुए घोर
युद्ध का वर्णन है। इसके लेखक कौन थे ?
जिनदत्त सूरि
✓​ ब्रजसेन सूरि
पल्हण
विजयसेन सूरि
2. 15वीं शताब्दी के अध्ययन का यह ग्रन्थ प्रमुख साधन
है। इसमें वास्तुकला का वर्णन है और यह कुम्भा के प्रमुख
शिल्पी मंडन द्वारा लिखा गया था। कौन सा ग्रन्थ है ?
अमर सार
राज रत्नाकर
प्रबंध चिंतामणि
✓​ राज वल्लभ
3. पृथ्वीराज राठौड़ किस भाषा में रचनाएं लिखते थे ?
पिंगल
फारसी
✓​ डिंगल
संस्कृत
4. जब उन्हें लगा कि राजस्थानी वीरों को विद्रोह के लिए
उकसाना एक बुझे दीपक में तेल डालने जैसा कार्य है, उन्होंने
700 दोहों की जगह 288 दोहे लिखकर ग्रन्थ अधूरा छोड़
दिया। कौन थे ?
चंडीदान
केशवदास
✓​ सूर्यमल्ल मिश्रण
केसरीसिंह बारहठ
5. हरियाणा की सीमा से जुड़ा जिला नहीं है?
हनुमानगढ़
✓​ बीकानेर
सीकर
जयपुर
6. जयपुर की अनुकृति (नकल) पर बसे इस छोटे शहर
का किला स्थल दुर्ग है। चारों ओर 20 फीट चौड़ी तथा 30
फीट गहरी खाई है। कौनसा शहर है ?
✓​ माधोराजपुरा
चौमूं
नीम का थाना
सांगानेर
7. वर्तमान में इस किले के ध्वंसा शेष, रावण दैहरा, के नाम
से जाने जाते हैं। किसी जमाने में यह बाला दुर्ग के नाम से
प्रसिद्ध था।
गागरोण दुर्ग
भटनेर दुर्ग
नाहरगढ़
✓​ अलवर का किला
8. 84 खम्भों पर स्थित इस वैष्णव मन्दिर पर स्थित
शिला लेख में प्रतिहारों की वंशावली उत्कीर्ण की हुई है।
श्री कृष्ण का यहां ननिहाल था और तब इस नगर
को ब्रह्मपुर कहते थे। कहां का मन्दिर, कौनसा नगर ?
डीग
✓​ कामां
बैर
बयाना
9. यह महल मात्र एक खम्भे पर खड़ा होने से ‘एक
खम्भा महल’ कहलाया था। एक खम्भा और उस पर तीन
मंजिला महल। इस आश्चर्यजनक
रचना को कहां देखा जा सकता है ?
बूंदी
आमेर
✓​ मंडोर
चित्तौड़
10. अजबदे पंवार कौन थी ?
✓​ महाराणा प्रताप की पत्नी
पृथ्वीराज चौहान की मां
स्वतंत्रता सेनानी
मेवाड़ की संत
11. महिला शिक्षा के प्रसार के लिए समर्पित
पद्मश्री मिस लूटर का कार्य क्षेत्र था।
उदयपुर
✓​ जयपुर
जोधपुर
अजमेर
12. पद्मभूषण और पत्रकारिता के स्तम्भ कहे जाने वाले
पं. झावर मल्ल शर्मा का जन्म किस ज़िले में हुआ था ?
सीकर
जयपुर
कोटा
✓​ झुन्झुनु
13. इन्होंने ‘दबाव आयनीकरण’ का सिद्धान्त देकर
अन्तरिक्ष भौतिकी को आंदोलित कर दिया। अपने
यहां उदयपुर में जन्मे ये वैज्ञानिक विश्वविद्यालय अनुदान
आयोग के अध्यक्ष भी रहे। ये पद्म विभूषण कौन थे?
✓​ डॉ. दौलतसिंह कोठारी
रामगोपाल विजय वर्गीय
डॉ. नगेन्द्रसिंह
डॉ. प्रमोद करण सेठी
14. आधी सदी तक वे शब्द चुनते रहे, लिखते रहे। दो लाख
शब्दों का अभूतपूर्व ‘राजस्थानी भाषा का शब्द कोष’ रचने
वाले इस शब्द पुरुष को राजस्थानी जुबान की मशाल
भी कहा गया है। ये थे -
सूर्यमल्ल मिश्रण
डॉ. एल. पी. टैस्सीटोरी
✓​ डॉ. सीताराम लालस
प्रतापनारायण पुरोहित
15. भेड़ व ऊन प्रशिक्षण संस्थान कहां स्थित है ?
ब्यावर
जोधपुर
✓​ जयपुर
बीकानेर
16. तीन कथनों पर विचार कीजिये और सही उत्तर बताइये
-
(1) ऊन उत्पादन में राजस्थान देश में सबसे आगे है।
(2) मांस उत्पादन में राजस्थान दूसरे स्थान पर है।
(3) अण्डा उत्पादन में राजस्थान दूसरे स्थान पर है।
सभी कथन सही है।
केवल 1 और 3 सही है।
✓​ केवल 1 सही है।
केवल 2 और 3 सही है।
17. ‘जर्सी’ गाय किस महाद्वीप से आई है ?
✓​ अमेरिका
योरोप
अफ्रीका
ऑस्ट्रेलिया
18. आसपास के निवासी इन्हें ‘सीता जी का मांडणा’ कहते
हैं, परन्तु विषय के जानकार इन्हें प्राचीन शैल चित्र कहते
हैं। इस स्थान पर ऐसे चित्र मिले है।
धौलपुर
✓​ अलनिया
भरतपुर
बैराठ
19. चित्र कला के लिए प्रसिद्ध संग्रहालय
‘सरस्वती भण्डार’ कहां है ?
जोधपुर
✓​ उदयपुर
बूंदी
कोटा
20. वर्तमान राष्ट्रीय राजमार्ग 11 का लम्बा इतिहास
रहा है। आगरा से मुल्तान को यही मार्ग जोड़ता था।
कौनसा शहर इस मार्ग पर स्थित नहीं है?
✓​ चुरू
दौसा
बीकानेर
सीकर
21. गुजरात की सीमा से सबसे नजदीक जिला मुख्यालय है
-
✓​ डूंगरपुर
जालोर
उदयपुर
सिरोही
22. कौनसी सम वर्षा रेखा राजस्थान को दो लगभग बराबर
भागों में बाँटती है ?
70 सेमी
40 सेमी
✓​ 50 सेमी
60 सेमी
23. राजस्थान में वर्ष में सबसे अधिक दिनों तक
वर्षा किस स्थान पर होती है ?
छबड़ा
झालरापाटन
✓​ मा. आबू
कुशलगढ़
24. पश्चिमी विक्षोभ से होने वाली मावट के लिए
कौनसी स्थायी पवनें जिम्मेदार होती हैं ?
उत्तर पश्चिमी पवनें
उत्तर पूर्वी व्यापारिक पवनें
✓​ दक्षिण पश्चिमी पवनें
दक्षिणी पूर्वी व्यापारिक पवनें
पश्चिमी विक्षोभ या वेस्टर्न डिस्टर्बन्स (Western
Disturbance) भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी इलाक़ों में
सर्दियों के मौसम में आने वाले ऐसे तूफ़ान को कहते हैं जो वायुमंडल
की ऊँची तहों में भूमध्य सागर, अन्ध महासागर और कुछ हद तक
कैस्पियन सागर से नमी लाकर उसे अचानक वर्षा और बर्फ़ के रूप
में उत्तर भारत, पाकिस्तान व नेपाल पर गिरा देता है।
इनका वहन पछुआ पवनों द्धारा होता है। ये दोनों गोलाद्धों में
उपोष्ण उच्च वायुदाब(३० डीग्री से ३५ डीग्री) कटिबन्धों से
उपध्रुवीय निम्न वायुदाब (६० डीग्री से ६५ डीग्री )
कटिबन्धों की ओर चलने वाली स्थायी पवन हैं ।
इनकी पश्चमी दिशा के कारण इन्हे पछुवा पवन कहते हैं ।
पृथ्वी के दोनों गोलार्धो में उपोष्ण उच्च वायु दाब कटिबंधो से
उपध्रुवीय निम्न वायुदाब कटीबंधो की ओर बहने
वाली स्थायी हवाओ को इनकी पश्चिम दिशा के कारण पछुआ पवन
कहा जाता है| उत्तरी गोलार्ध में ये दक्षिण-पश्चिम से उत्तर -पूर्व
की ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में उत्तर - पश्चिम से दक्षिण-पूर्व
की ओर बहती है|
25. राज्य में वाष्पोत्सर्जन की सबसे कम दर यहां है।
चुरू
झालावाड़
✓​ बाँसवाड़ा
जैसलमेर
V
K
T

1. हल्के भूरे रंगों के (कपिष वर्ण) मिट्टी के बर्तनों पर काले व
नीले रंग के चित्र यहां पर बनते थे। मकान पत्थरों से बनाये जाते थे,
ईंटों का प्रयोग नहीं होता था। ताम्र उपकरण और आभूषण इस
सभ्यता की शोभा बढ़ाते थे।
✓​ गणेश्वर
कालीबंगा
आहड़
बालाथल
गणेश्वर, राजस्थान के सीकर ज़िला के अंतर्गत नीम-का-
थाना तहसील में ताम्रयुगीन संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण स्थल है।
गणेश्वर से प्रचुर मात्रा में जो ताम्र सामग्री पायी गयी है, वह
भारतीय पुरातत्त्व को राजस्थान की अपूर्व देन है। ताम्रयुगीन
सांस्कृतिक केन्द्रों में से यह स्थल प्राचीनतम स्थल है।
खेतड़ी ताम्र भण्डार के मध्य में स्थित होने के कारण गणेश्वर
का महत्त्व स्वतः ही उजागर हो जाता है। यहाँ के उत्खनन से कई
सहस्त्र ताम्र आयुध एवं ताम्र उपकरण प्राप्त हुए हैं। इनमें
कुल्हाड़ी, तीर, भाले, सुइयाँ, मछली पकड़ने के काँटे, चूड़ियाँ एवं
विविध ताम्र आभूषण प्रमुख हैं। इस सामग्री में 99 प्रतिशत
ताँबा है। ताम्र आयुधों के साथ लघु पाषाण उपकरण मिले हैं, जिनसे
विदित होता है कि उस समय यहाँ का जीवन भोजन
संग्राही अवस्था में था। यहाँ के मकान पत्थर के बनाये जाते थे।
पूरी बस्ती को बाढ़ से बचाने के लिए कई बार वृहताकार पत्थर के
बाँध भी बनाये गये थे। कांदली उपत्यका में लगभग 300 ऐसे
केन्द्रों की खोज़ की जा चुकी हैं, जहाँ गणेश्वर संस्कृति पुष्पित-
पल्लवित हुई थी।
2. प्राचीन सभ्यता ‘गिलूण्ड’ के अवशेष किस नदी के किनारे और
किस जिले में मिले है ?
रूपारेल, भरतपुर
✓​ बनास, राजसमन्द
लूनी, पाली
खारी, भीलवाड़ा
आघाटपुर-आयड़ सभ्यता का एक महत्वपूर्ण स्थान
राजसमन्द जिले में गिलूण्ड है जो बनास नदी के तट पर
बसा है। इस स्थान का उत्खनन सन् १९५९-६० में
श्री बी.बी. लाल के निर्देशन में हुआ। तीसरा महत्वपूर्ण
स्थान है बालाथल जो उदयपुर जिले के वल्लभनगर तहसील में
स्थित है। यह उदयपुर से उत्तर पूर्व लगभग ४० किलोमीटर
दूर है जिसका उत्खनन श्री बी.एम. मिश्र के निर्देशन में
१९९३-९४ में हुआ। यह टीला बालाथल गांव के पास है
जो तीन हेक्टर क्षेत्र में फैला है। इस टीले
का उत्तरी आधा भाग सुरक्षित है तथा दक्षिणी आधा भाग
एक स्थानीय कृषक द्वारा समतल कर दिया गया है और इस
पर खेती होती है। (पुरातत्व विमर्श-जयनारायण पाण्डेय-
पृ.४५१)
3. ‘राजस्थान संगीत’ नामक पुस्तक के लेखक -
विजयसिंह पथिक
✓​ सागरमल गोपा
सुमनेश जोशी
जयनारायण व्यास
4. तारीख-ए-राजस्थान के लेखक थे -
खाफी खां
✓​ कालीराय कायस्थ
ज्वाला सहाय
मूलचंद मुंशी
5. ‘राजरत्नाकर’ के लेखक थे -
जीवाधर
✓​ सदाशिव
रघुनाथ
कृष्ण भट्ट
6. जयानक भट्ट रचित ‘पृथ्वीराज विजय’ की भाषा थी -
फारसी
डिंगल
✓​ संस्कृत
पिंगल
7. ‘ट्रेवल्स इन वेस्टर्न इण्डिया’ के लेखक ने राजस्थान के
इतिहास को बड़ा योगदान दिया है। इनका नाम था -
✓​ जेम्स टॉड
डफ ग्रांट
हरयन गोल्ज
जी.एच. ट्रेबर
कर्नल टॉड द्वारा भारत भ्रमण के अनुभव पर आधारित यह
पुस्तक 1839 में उनकी मृत्यु (1835) के पश्चात प्रकाशित
हुई  थी।
8. स्वरूपशाही, चांदोड़ी, शाहआलमी, ढींगला एवं
सिक्काएलची किस रियासत के प्रचलित सिक्के थे ?
अलवर
डूंगरपुर
जयपुर
✓​ मेवाड़
मेवाड़ में मुद्रा का प्रचलन - १८ वीं सदी के पूर्व मेवाड़ में  मुगल
शासको के नाम वाली “सिक्का एलची’ का प्रचलन था, लेकिन
औरंगजेब के बाद मुगल साम्राज्य का प्रभाव कम हो जाने के कारण
अन्य राज्यों की तरह मेवाड़ में भी राज्य के सिक्के ढ़लने लगे।
१७७४ ई. में उदयपुर में एक अन्य टकसाल खोली गई। इसी प्रकार
भीलवाड़ा की टकसाल १७ वीं शताब्दी के पूर्व से ही स्थानीय
वाणिज्य- व्यापार के लिए “भीलवाड़ी सिक्के’ ढ़ालती थी। बाद में
चित्तौड़गढ़, उदयपुर तथा भीलवाड़ा तीनों स्थानों के टकसालों पर
शाहआलम (द्वितीय) का नाम खुदा होता था। अतः यह “आलमशाही’
सिक्कों के रुप में प्रसिद्ध हुआ। राणा संग्रामसिंह द्वितीय के काल
से इन सिक्कों के स्थान पर कम चाँदी के मेवाड़ी सिक्के का प्रचलन
शुरु हो गया। ये सिक्के चित्तौड़ी और उदयपुरी सिक्के कहे गये।
आलमशाही सिक्के की कीमत अधिक थी।
१०० आलमशाही सिक्के = १२५ चित्तौड़ी सिक्के
उदयपुरी सिक्के की कीमत चित्तौड़ी से भी कम थी। आंतरिक
अशांति, अकाल और मराठा अतिक्रमण के कारण
राणा अरिसिंह के काल में चाँदी का उत्पादन कम हो गया।
आयात रुक गये। वैसी स्थिति में राज्य- कोषागार में
संग्रहित चाँदी से नये सिक्के ढ़ाले गये,
जो अरसीशाही सिक्के के नाम से जाने गये। इनका मूल्य था–
१ अरसी शाही सिक्का = १ चित्तौड़ी सिक्का = १ रुपया ४
आना ६ पैसा।
राणा भीम सिंह के काल में मराठे
अपनी बकाया राशियों का मूल्य- निर्धारण
सालीमशाही सिक्कों के आधार पर करने लगे थे। इनका मूल्य
था —
सालीमशाही १ रुपया = चित्तौड़ी १ रुपया ८ आना
आर्थिक कठिनाई के समाधान के लिए सालीमशाही मूल्य के
बराबर मूल्य वाले सिक्के का प्रचलन किया गया, जिन्हें
“चांदोड़ी- सिक्के’ के रुप में जाना जाता है। उपरोक्त
सभी सिक्के चाँदी, तांबा तथा अन्य धातुओं की निश्चित
मात्रा को मिलाकर बनाये जाते थे। अनुपात में
चाँदी की मात्रा तांबे से बहुत ज्यादा होती थी।
इन सिक्कों के अतिरिक्त त्रिशूलिया,
ढ़ीगला तथा भीलाड़ी तोबे के सिक्के भी प्रचलित हुए। १८०५
-१८७० के बीच सलूम्बर जागीर द्वारा “पद्मशाही’
ढ़ीगला सिक्का चलाया गया, वहीं भीण्डर जागीर में
महाराजा जोरावरसिंह ने “भीण्डरिया’ चलाया। इन
सिक्कों की मान्यता जागीर लेन- देन तक ही सीमित थी।
मराठा- अतिक्रमण काल के “मेहता’ प्रधान ने “मेहताशाही’
मुद्रा चलाया, जो बड़ी सीमित संख्या में मिलते हैं।
राणा स्वरुप सिंह ने वैज्ञानिक सिक्का ढ़लवाने का प्रयत्न
किया। ब्रिटिश सरकार की स्वीकृति के बाद नये रुप में
स्वरुपशाही स्वर्ण व रजत मुद्राएँ ढ़ाली जाने लगी।
जिनका वजन क्रमशः ११६ ग्रेन व १६८ ग्रेन था। १६९ ग्रेन
शुद्ध सोने की मुद्रा का उपयोग राज्य- कोष की जमा –
पूँजी के रुप में तथा कई शुभ- कार्यों के रुप में होता था।
पुनः राज्य कोष में जमा मूल्य की राशि के बराबर चाँदी के
सिक्के जारी कर दिये जाते थे। इसी समय में
ब्रिटिशों का अनुसरण करते हुए आना, दो आना व आठ
आना, जैसे छोटे सिक्के ढ़ाले जाने लगे, जिससे हिसाब-
किताब बहुत ही सुविधाजनक हो गया। रुपये- पैसों को चार
भागों में बाँटा गया पाव (१/२), आधा (१/२), पूण (१/३)
तथा पूरा (१) सांकेतिक अर्थ में इन्हें ।, ।।, ।।। तथा १
लिखा जाता था। पूर्ण इकाई के पश्चात् अंश इकाई लिखने के
लिए नाप में s चिन्ह का तथा रुपये – पैसे में o ) चिन्ह
का प्रयोग होता था।
ब्रिटिश भारत सरकार के सिक्कों को भी राज्य में वैधानिक
मान्यता थी। इन सिक्कों को कल्दार कहा जाता था।
मेवाड़ी सिक्कों से इसके मूल्यांतर को बट्टा कहा जाता था।
चांदी की मात्रा का निर्धारण इसी बट्टे के आधार पर
होता था। उदयपुरी २.५ रुपया को २ रुपये कल्दार के रुप में
माना जाता था। १९२८ ई. में नवीन सिक्कों के प्रचलन के
बाद तत्कालीन राणा भूपालसिंह ने राज्य में प्रचलित इन
प्राचीन सिक्कों के प्रयोग को बंद करवा दिया।
9. राजस्थान राज्य अभिलेखागार यहां स्थित है।
✓​ बीकानेर
जयपुर
अजमेर
जोधपुर
बीकानेर स्थित राजस्थान राज्य अभिलेखागार देश के सबसे अच्छे
और विश्व के चर्चित अभिलेखागारों में से एक है. इस अभिलेखागार
की स्थापना 1955 में हुई और यह अपनी अपार व अमूल्य अभिलेख
निधि के लिए प्रतिष्ठित है।
10. ‘प्राण मित्रों भले ही गंवाना, पर यह झण्डा न नीचे
झुकाना’ नामक प्रसिद्ध गीत के रचयिता थे -
जयनारायण व्यास
हीरालाल शास्त्री
✓​ विजयसिंह पथिक
तेजकवि
11. सरदार कुदरत सिंह का सम्बन्ध किससे है ?
ब्ल्यू पोटरी
✓​ मीनाकारी
तलवार बाजी
घुड़सवारी
सरदार कुदरत सिंह मीनाकारी में विशेष उपलब्धि हेतु 1988
में पद्मश्री से सम्मानित हो चुके है।
12. रिडकोर का कार्य है।
पर्यटन सुविधा झुटाना
✓​ सड़क निर्माण
झील संरक्षण
कन्टेनर संचालन
13. राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं विनियोजन
निगम लि. (रीको) के उद्देश्यों में शामिल नहीं है-
उद्योग विकास केन्द्रों की स्थापना करना
औद्योगिक क्षेत्रों का विकास करना
✓​ लघु उद्योगों को कच्चे माल की आपूर्ति करना
मध्यम व बड़े उद्योगों को वित्तीय सहायता देना
14. खेतड़ी का तांबा संयंत्र अमेरिकी कंपनी के सहयोग से
और देवारी का जस्ता संयंत्र ब्रिटेन के सहयोग से 60 के
दशक में स्थापित किया गया। अब देबारी संयंत्र
का अधिकांश हिस्सा इस समूह को बेच दिया गया है।
✓​ वेदान्ता
रिलायन्स
टाटा
बिड़ला
15. हिन्दुस्तान कॉपर लि. राजस्थान में खनिज तांबे के गलन
एवं शोधन का कार्य करने वाला भारत सरकार
का सार्वजनिक उपक्रम है। इसका मुख्यालय कहां है?
दिल्ली
✓​ कोलकाता
मुम्बई
चैन्नई
हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड की स्थापना कोलकाता में 9
नवम्बर,1967 को हुई थी । यह भारत की एकमात्र शीर्षस्थ
एकीकृत बहु इकाई ताम्र उत्पादक कंपनी है जो ताम्र कैथोड, निरंतर
ढलाई वायर रॉड और वायर बार के खनन, सज्जीकरण, प्रगालन,
परिष्करणन और निर्माण के बहुत सारे कार्य करती है ।
16. 2007 की पशुगणना के अनुसार राजस्थान में
मुर्गियों की संख्या लगभग है।
30 लाख
✓​ 50 लाख
70 लाख
80 लाख
17. फाल्गुन में भरने वाला पशुमेला है -
चन्द्रभागा पशुमेला, झालरापाटन
जसवन्त पशुमेला, भरतपुर
रामदेव पशुमेला, नागौर
श्री शिवरात्रि पशुमेला, करौली
18. 2007 की पशुगणना में जिस पशु की संख्या में
सर्वाधिक प्रतिशत वृद्धि हुई है, वह है -
गाय
✓​ बकरी
भेड़
भैंस
19. राणा के प्रताप के प्रसिद्ध घोड़े चेतक के वंशज यहां पर
तैयार किये जाने की योजना चल रही है
मनोहर थाना
✓​ बीकानेर
उदयपुर
सांचोर
20. होली के तेरह दिनों बाढ रंग तेरस पर माण्डल कस्बे में
यह नृत्य किया जाता है -
✓​ नाहर
बिन्दौरी
चकरी
घूमर
भीलवाडा से 14 किलोमीटर दूर स्थित माण्डल कस्बे में प्राचीन
स्तम्भ मिंदारा पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। यहाँ से कुछ
ही दूर मेजा मार्ग पर स्थित प्रसिद्ध जगन्नाथ कछवाह की बतीस
खम्भों की विशाल छतरी ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व का स्थल
हैं। छह मिलोकमीटर दूर भीलवाडा का प्रसिद्ध पर्यटन स्थल
मेजा बांध हैं। होली के तेरह दिन पश्चात रंग तेरस पर आयोजित नाहर
नृत्य लोगों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र होता हैं। कहते हैं
कि शाहजहाँ के शासनकाल से ही यहाँ यह नृत्य होता चला आ
रहा हैं। यहां के तालाब के पाल पर प्राचीन शिव मंदिर स्थित है।
जिसे भूतेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है।
21. राजस्थान में किस नदी के किनारे सवाई भोज
द्वारा निर्मित मंदिर है ?
मेनाल
✓​ खारी
मानसी
बनास
22. राजस्थान व मध्य प्रदेश के ये जिले पड़ोसी राज्यों से
दो विपरीत दिशाओं में सीमा बनाते हैं -
बाँसवाड़ा, मन्दसौर
✓​ कोटा, रतलाम
धौलपुर, ग्वालियर
झालावाड़, गुना
23. ईरा, चाप और मोरन, किस नदी की सहायक है ?
बनास
चम्बल
लूनी
✓​ माही
24. जून 2011 में सूखा सम्भाव्य क्षेत्र कार्यक्रम कितने
ज़िलों में लागू रहा ?
14
✓​ 11
13
12
25. स्व- जलधारा कार्यक्रम का उद्देश्य है -
पर्यटन सुविधा
✓​ पेयजल सुविधा
नदी संरक्षण
सिंचाई सुविधा
ग्रामीण जनता की पेय-जल की समस्या को हल करने के लिए
केन्द्र सरकार द्वारा स्व-जलधारा कार्यक्रम
चलाया जा रहा है। इसके अंतर्गत १० प्रतिशत समुदाय
या ग्राम-पंचायत की भागीदारी होगी और ९० प्रतिशत
केन्द्र सरकार पैसा देगी।

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